हम बात कर रहे हैं बारां जिले के नाहरगढ़ के किले की, जो राजस्थान में हाड़ौती के लाल किले के नाम से मशहूर है। 17 वी शताब्दी का वह दौर जब हिंदुस्तान की बादशाहत मुगलों के हवाले थी, दिल्ली के लाल किले पर औरंगजेब गद्दीनशीन था, हिन्द की सीमाएं अफगानिस्तान से लेकर बर्मा तक, जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लगती थी, जब ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने भारत में जड़े जमा रही थी, बड़ी रियासतें छोटी रियासतों पर कब्जा कर रही थी, रोज जागीरें बनती बिगडती, इतिहास की ईबारतों में रोज एक नया अध्याय जुड़ जाता।उस दौर में नाहरगढ़ के किले का इतिहास भी जन्म ले रहा था।.
इतिहास की किताबों के पन्ने पलटे तो नाहरगढ़ का इतिहास खिंचीवाड़ा राजवंश से मंसूब था तथा गुगोर के खिंचियो के अधीन था। तब बारां जिले का अधिकांश भाग खिंची राजाओं के अधीन था, रामगढ़ के राठौड़ का विवाह डॉब में खींची राजा की बहन से हुआ था। तब दहेज में खींची राजा ने अपनी बहन को 4 गांव दिए थे उस समय नाहरगढ़ नाम से कोई गांव नहीं था लेकिन बालापुरा के नाम से इस क्षेत्र की पहचान थी। उस राजा की बहन से 4 पुत्र हुए नाहर सिंह, शेर सिंह, किशोर सिंह एवं साहब सिंह, रानी के सबसे जेष्ठ पुत्र नाहरसिंह महत्वकांक्षी थे, किला बनाने की अनुमति को लेकर वह अपने मामा खींची से मिलने । लेकिन मामा को अपने भांजे नाहरसिंह का यह विचार पसंद नहीं आया तथा किला बनाने की अनुमति नहीं दी लेकिन भांजा नाहरसिंह अपने लिए किला बनाना चाहता था। किला बनाने की जिद को लेकर नाहरसिंह अपने भाइयों के साथ दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की शरण में चला गया। औरंगजेब ने नाहरसिंह को किला बनाने की अनुमति तो दे दी साथ में खूब धन दौलत भी दी लेकिन जब नाहरसिंह दिल्ली से लौटे तब वह नाहरदिल खान हो चुके थे। अब वह राजा नहीं नवाब कहलाने लगे। धर्म से पथभ्रष्ट होने पर मामा को यह बात खल गई यही से ही मामा और भांजे में कड़वाहट पैदा हो गई। जबकि नाहरदिल खान ने अपने भाइयों के साथ किला बनवाना शुरू कर दिया। तथा अपनी अलग जागीरी गांव का नाम अपने नाम से नाहरगढ़ रखा। उस दौरान मामा चाहता तो अपने भांजे को धराशाई करके किला का निर्माण रोक सकता था लेकिन नाहरदिल खान की सीधी दिल्ली के बादशाह औरंगजेब तक पहचान होने के चलते हाड़ा और खींची राजाओं ने धैर्य रखा। लेकिन नाहरसिंह के शासन को नष्ट करने की फिराक में लगे रहे। बाद में एक मुठभेड़ में राधौगढ़ के राजा लाल सिंह ने राजपूती कलंक मिटाने के लिए नाहर दिल खान को मौत के घाट उतार दिया। वह शहीद हो गए बाद में किले में ही उनकी मजार नेकनाम बाबा के नाम से मशहूर है। बाद में किले का निर्माण उनके पुत्र कुतुबुद्दीन खान राठौड़ ने पूर्ण करवाया। 1679 ईस्वी में किला लगभग बन चुका था। किले के अग्रभाग के बाई और ब्रिज के शिलालेख का अध्ययन करें तो फारसी में लिखा है कोटा महाराव दुर्जन साल के कहने पर दिल्ली पर आक्रमण करने जा रहे बाजीराव पेशवा ने थोड़े धन के बदले एक दिन की लड़ाई में नाहरगढ़ को जीतकर कोटा राज्य के हवाले कर दिया तब से किला कोटा राज्य में था अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
यह किला षट्भुज आकृति में बना हुआ है। इसका क्षेत्रफल 10 बीघा से अधिक है। यह किला समतल जमीन पर बना है। लाल पत्थरो से निर्मित होने के कारण इसको लालकिला कहा जाता है। किले में कुल 11 बुर्ज है जो उंची ऊंची प्राचीरो से घिरी हुई है। किले का प्रवेशद्वार उत्तरमुखी है। जो बहुत सुंदर और कलात्मक है। किले के अंदर बहुत सी इमारतें हैं।
दरबारे आम - यह बहुत कलात्मक सुंदर सभा भवन है। जो दो दर्जन से अधिक अंलकृत खंबो पर टिका हुआ। इसकी छत डाटदार है। जिस पर चटख रंगों से बेलबुटो और पुष्पो से अंलकृत आकृतियां बनी हुऐ हैं।
दरबार खा - यह भवन तीन मंजिला है। इसमें ऊपर के भाग में राजा का निवास था। मध्य के भाग में सैनिक दस्तो के उपयोग के लिए था। नीचे का भाग गुप्त मंत्रणा हेतु विशेष कक्ष बने हैं।इसमें खास लोगों से साथ चर्चा की जाती थी। इसलीऐ इसको दरबारे खास कहा जाता था।
रानी महल - यह इमारत किले पश्चिमी भाग में किशोर सागर के पास बनी है। यह दो मंजिला इमारत अपनी खुबसुरती के लिए जानी जाती है। इसके खिड़कियां और झरोखे तालाब की तरफ खुलते हैं।
शाही हौज - यह स्थान रानी महल के पास बना हुआ। इसका फर्श पक्का और टांके का है यह स्नान और जल संग्रह के काम आता था।
मोती कुआं - रानी महल के पास ही कुआं बना है। जो किले की राजकुमारी मोतीकुंवर के नाम से मोती कुआं है।
शाही हरम - किले के दक्षिण पुर्व की प्राचीर के पास एक खंडहरनुमा इमारत है । जिसमे नवाब की बैगमे रहा करती थी।
नेकराम साहब की दरगाह - किले में पुर्वी प्राचीर के मध्य में नेकनाम साहब की दरगाह है। नेकनाम साहब की दरगाह में हिन्दु और मुश्लिम समान रूप से जाते हैं ।यहां वर्ष एक बार उर्स भी भरता है।
आशापाला माता का मंदिर - किले में मां आशापाला का भव्य मंदिर बना हुआ है। नगर में आशापाला माता की बहुत अधिक मान्यता है। नवरात्रा में माता का विशेष श्रंगार किया जाता है।
कांचमहल - किले में टंकी के पास एक सुंदर कक्ष बना हुआ है। जिसकी छत डांटदार और इसमें किसी जमाने में कांच जड़ें हुऐ थे। इसलीऐ इसको कांच महल कहा जाता है। किले में अंदर आने और बाहर जाने की किले कुछ सुरगें भी बनी हुई थी। किले में स्थान स्थान तोपें रखने के स्टैड भी बने हुऐ हैं। जहां पर किले की सुरक्षा हेतु तोपों को तैनात किया जाता था। यह किला मुगल और राजपुत स्थापत्य कला का बेजोड़ नमुना है।
किशोर सागर तालाब - किले के पश्चिमी प्राचीर से सटा हुआ। एक तालाब बना हुआ है। इसको वर्तमान में छोटा तालाब के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण नाहर सिंह के भाई किशोरसिंह ने करवाया था। इस तालाब में स्नान के लिए सुंदर और कलात्मक घाट बने हुऐ हैं। तालाब का फर्श पक्का बना हुआ है।
शाही बाग - किले की दक्षिणी प्राचीर से सटा हुआ एक भाग हुआ करता था। जिसको जिन्दल साहब के नाम के नाम से लोग जानते हैं लेकिन इस बाग का असली नाम कृष्ण बिलास बाग था। जिसको नाहरसिंह के एक भाई ने बनवाया था। इस भाग में आराम करने के लिए बारहदरी बनी हुई है। यही नहीं बाग का प्रवेशद्वार भी बहुत सुंदर था। इस बाग में बहुत ज्यादा पेड़ पौधे थे ।राजपरिवार के लोग यहां सैर सपाटे लिए यहां आया करते थे ।
साभार : खींची चौहान इतिहास संग्रह (लेखक ठाकुर माधव सिंह) खींची द सर्वे ऑफ खिंची चौहान हिस्ट्री ( लेखक ए.एच. निजामी, आर. एस. ) खींची हाडोती के लाल किले (लेखक हंसराज नागर )